Poetry

क्या मैं इसलिये

क्या?

मैं दुखी हूं

उसके लिये जो

मेरे हिस्से में आया नहीं

या नाखुश हूं, कि

रिश्तों से मुझे निराशा मिली

परेशान हूं इसलिये कि

सूरज रोज़ डूब जाता है

अकेला छोड़ कर मुझे

या सिर्फ़ इसलिये रोती हूं कि

मेरा दर्द उसे कभी दिखा नहीं

मेरी शिक़ायत ये तो नहीं उससे कि

पलट कर दोबारा उसने खबर ली नहीं मेरी

कहीं ये तो नहीं कचोटता मुझे

कि उम्र ढल रही है मेरी

और वो बेफ़िक़्र अब टहलता नहीं अपने ओंठो से ,

मेरे ज़िस्म के लहरदार किनारों पे

और गुम नहीं होता आजकल वो

भटक कर मेरी गहरी कंदराओं में

नहीं …..मैं रो रही हूं कि

मैं भी इंसान हूं, औरों की तरह

जो मानते हैं आंसू और वक़्त

मरहम है ज़ख़्मों के

इसीलिये रोज़ डर के गलियारे से

गुज़र एक नयी चोट खाती हूं

रोती हूं रोज़….मैं

अपनी ताक़त में

दर रोज इज़ाफे के लिये

——– रविकान्त राऊत

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